Thursday, 5 November 2015

रुबाई

राति बीतल जाइए
मोन तीतल जाइए
हारि बैसल छी हिया
प्रेम जीतल जाइए

ओम प्रकाश

गजल

मोन वैह गलती बेर बेर करैए
चान केर चाहत आब फेर करैए
पूरलै कहाँ पहिलुक सबेरक सपना
आस नब किए एखनहुँ ढेर करैए
जीबि रहल मारल मोन भूमि धएने
सदिखने तँ ई जिनगी अन्हेर करैए
भाँग पीबि सनकल नाचि रहल मनुख ई
सनकि सनकि कोना ई घरेर करैए
मोन भरि छलै गप ओम केर हिया मे
ओहिना तँ नै गप सेर सेर करैए
ओम प्रकाश

गजल

हमर बात कियो बुझलक कहाँ
हमर मोन कियो तकलक कहाँ
चमकि गेल छलै बिजुरी कतौ
हमर अन्हार कियो हरलक कहाँ
बात सुनल सभक नमहर सदति
हमर छोट कियो सुनलक कहाँ
राखि हाथ मे बम आ पिस्तौल
हमर नाच कियो नचलक कहाँ
ओम जपि हरक नाम सदिखन
हमर नाम कियो जपलक कहाँँ

गजल

आब हम बहुत सुधरि गेल छी
कष्ट तँ अनकर बिसरि गेल छी
की समाज आ की सामाजिकता
ऐ सँ कहिये सँ ससरि गेल छी
कखन चमकतेै मेघ गगन मे
रातिये सँ हम उमरि गेल छी
जूनि चिकरबै सभक हाल पर
मारि खा क' सब कुहरि गेल छी
ओम निखरलै चुपे रहि बैसले
सब कियो अहूँ निखरि गेल छी

Friday, 14 November 2014

गजल

अपन मोनक कहल मारि बैसल छी
छलै खिस्सा लिखल फाडि बैसल छी

हँसी हुनकर हमर मोनमे गाडल
करेजा अपन हम हारि बैसल छी

पढू भाषा नजरि बाजि रहलै जे
किए हमरा अहाँ बारि बैसल छी

सिनेहक बूझलौं मोल नै कहियो
अहाँ गर्दा जकाँ झारि बैसल छी

जमाना कहल मानैत छी सदिखन
कहल "ओम"क अहाँ टारि बैसल छी
- ओम प्रकाश
मफाईलुन-फऊलुन-मफाईलुन (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर)

गजल

कानैत आँखिक आगिमे जरल आकाशक शान छै
बेथा करेजक लहकि गेलैसभक झरकल मान छै

बैसल रहै छी प्रभुक दरबारमे न्यायक आसमे
हम बूझलौं नै बातभगवान ऐ नगरक आन छै

सदिखन रहैए मगन अपने बुनल ऐ संसारमे
चमकैत मोनक गगनमे जे विचारक ई चान छै

आसक दुआरिक माटि कोडैत रहलौं आठो पहर
सुनगैत मोनक साज पर नेहमे गुंजित गान छै

सूखल मुँहक खेती सगर की कहू धरती मौन छै
मुस्की सभक ठोरक रहै यैह "ओम"क अभिमान छै
- ओम प्रकाश
दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घदीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घदीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घदीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ,
मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर)

Friday, 7 March 2014

गजल

हमरा अहाँमे जे मेल छल
ओ ओहिना कोनो खेल छल

बान्हल सिनेहक हम डोरि जे
हुनका किया लागल जेल छल

पिछरल हमर डेगक की कहू
पघिलल करेजक से तेल छल

ककरो कियो किछु सुनलक कहाँ
एहन मचल रेलमपेल छल

"ओम"क करेजा सदिखन कहल
मुस्की हुनक हमरे लेल छल

(दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व, दीर्घ)- प्रत्येक पाँतिमे एक बेर

Thursday, 6 February 2014

गजल

राम जपैत छी रहम करू
कृष्ण सुमरि अहाँ करम करू

कष्ट अनकर बूझिकऽ सदिखन
धन्य कनी अपन जनम करू

कानि रहल बहिन-माय अपन
अंतरमे कनी शरम करू

पजरत आगि ठंढा हियमे
अपन विचारकेँ गरम करू

"ओम"क बात राजा सुनि लिअ
राजक आब किछु धरम करू

दीर्घ, ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ(मुतफाइलुन), दीर्घ, ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ
२-११२१२-२-११२ (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर)

Friday, 31 January 2014

गजल

हेतै खतम गुटबाज बेबस्था
बनतै सभक आवाज बेबस्था

भेलै बहुत चीरहरणक खेला
राखत निर्बलक लाज बेबस्था

देसक आँखिमे नोर नै रहतै
सजतै माथ बनि ताज बेबस्था

मिलतै सभक सुर ताल यौ ऐठाँ
एहन बनत ई साज बेबस्था

"ओम"क मोन कहि रहल छै सबकेँ
करतै आब किछु काज बेबस्था

दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-लघुदीर्घ-दीर्घ-लघु-दीर्घदीर्घ-दीर्घ प्रत्येक पाँतिमे एक बेर।

२२२१-२२१२-२२

Thursday, 12 September 2013

गजल

आइ किछु मोन पडलै फेरसँ किए
भाव मोनक ससरलै फेरसँ किए

टाल लागल लहासक खरिहानमे
गाम ककरो उजडलै फेरसँ किए

आँखि खोलू, किए छी आन्हर बनल
नोर देशक झहरलै फेरसँ किए

चान शोभा बनै छै गगनक सदति
चान नीचा उतरलै फेरसँ किए

"ओम" जिनगी अन्हारक जीबै छलै
प्राण-बाती पजरलै फेरसँ किए
(दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)-(दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ)
(फाइलातुन-फऊलुन-मुस्तफइलुन) - १ बेर प्रत्येक पाँतिमे

Thursday, 5 September 2013

गजल

कहियो तँ हमर घरमे चान एतै
नेनाक ठोर बिसरल गान गेतै

निर्जीव भेल बस्ती सगर सूतल
सुतनाइ यैह सबहक जान लेतै

मानक गुमान धरले रहत एतय
नोरक लपटिसँ झरकिकऽ मान जेतै

सुर ताल मिलत जखने सभक ऐठाँ
क्रान्तिक बिगुलसँ गुंजित तान हेतै

हक अपन "ओम" छीनत ताल ठोकिकऽ
छोडब किया, कियो की दान देतै

(दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ)-(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)
(मुस्तफइलुन-मफाईलुन-फऊलुन)- प्रत्येक पाँतिमे एक बेर

Thursday, 28 February 2013

गजल


तीतल हमर मोन हुनकर सिनेहसँ
भेलौं हम सदेह देखू विदेहसँ

के छै अपन, आन के, बूझलौं नै
लडिते रहल मोन मोनक उछेहसँ

नाचै छी सदिखन आनक इशारे
करतै आर की बडद बन्हिकऽ मेहसँ

छोडत संग एक दिन हमर काया
तखनो प्रेम बड्ड अछि अपन देहसँ

काजक बेर मोन सबकेँ पडै छी
"ओम"क भरल घर सभक एहि नेहसँ

मफऊलातु-फाइलातुन-फऊलुन (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर)

Wednesday, 27 February 2013

गजल


अहाँ हमरासँ एना नै रूसल करू
कनी प्रेमक सनेसाकेँ बूझल करू

हमर जिनगीक बाटक छी संगी अहीं
करेजक बाट कखनो नै छोडल करू

बहन्ना फुरसतिक करिते रहलौं अहाँ
अहाँ कखनो तँ हमरो लग बैसल करू

बहुत मारूक अछि नैनक भाषा प्रिये
अपन नैनक कटारी नै भोंकल करू

करेजा हमर फुलवारी प्रेमक बनल
सिनेहक फूल ई सदिखन लोढल करू

अहीं जिनगी, अहीं साँसक डोरी हमर
करेजक आस नै "ओम"क तोडल करू

(मफाईलुन-मफाईलुन-मुस्तफइलुन)- प्रत्येक पाँतिमे एक बेर

गजलक लेल (समीक्षा)


गजलक लेल (समीक्षा)
श्री विजय नाथ झाजीक गीत-गजल संग्रहक पोथीक नाम अछि "अहींक लेल"। ऐ पोथीमे गीत आ गजलक फराक-फराक दूटा प्रभाग छै। हम ऐ पोथीक गजल प्रभागक संबंधमे ऐठाँ किछु चर्चा करऽ चाहब। ऐ पोथीमे गजलकार श्री विजय नाथ झाजीक अठहतरिटा गजल प्रकाशित भेल अछि। पोथीक गजल पढलासँ ई पता चलैत अछि जे किछु गजल केँ छोडिकऽ बेसी ठाँ काफिया आ रदीफक निअमक पालन कएल गेल अछि। पृष्ठ संख्या ४७, ५०, ५४, ५५, ५६, ६७, ७१, ७४, ७५, ८२, ९४, १०१, ११०, ११४ पर छपल गजलमे काफिया गडबडाएल अछि। ऐठाँ ई धेआनमे राखबाक चाही जे बिना दुरुस्त काफियाक रचना गजल नै भऽ सकैए। तखनो अधिकांश गजलक काफिया दुरुस्त अछि, जे गजलक विकास यात्राक हिसाबेँ एकटा नीक लक्षण अछि। काफिया, रदीफ आ गजलक व्याकरणक निअम पालन करबाक हिसाबेँ गजलकार ओहि गजलकार सभसँ फराक श्रेणीमे छथि जे गजलक व्याकरणकेँ नै मानबाक सप्पत खएने छथि।
ऐ गजल संग्रहक गजल सब कोन बहरमे लीखल गेल अछि, ऐ पर गजलकार मौन छथि। गजलक नीचाँमे बहरक नाम जरूर लीखल जएबाक चाही। बहरक ज्ञान नब पीढीक गजलकार सभमे बढेबामे ई महत्वपूर्ण डेग हएत। ओना तँ गजलकार कोनो गजलक नीचाँमे बहरक नाम नै लीखने छथि, मुदा गजल सभकेँ पढलासँ ई पता चलैत छै जे ऐ संग्रहक ढेरी गजल एहन अछि जाहिमे अरबी बहरक निअमक पालन करबाक नीक प्रयास कएल गेल अछि। ई स्वागत योग्य गप अछि। ऐसँ इहो पता चलैत अछि जे गजलकार अरबी बहरसँ नीक जकाँ परिचित छथि आ जँ ई बात अछि तँ हुनका बहरक नाम गजलक नीचाँमे फरिछाकेँ लीखबाक चाही। ऐ संदर्भमे हम पोथीक सबसँ पहिलुक गजलक (पृष्ठ संख्या ४५) मतलाकेँ उद्धृत करऽ चाहै छी-
हमर पूजा, हमर परिचय, हमर शृंगार छी अपने
सकल सौभाग्य, मन, काया, रुधिर-संचार छी अपने
आब एकर मात्रा संरचना पर धेआन दिऔ, तँ पता चलै छै जे ऐमे मूल ध्वनि मफाईलुन माने "ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ" सब पाँतिमे चारि बेर प्रयोग कएल गेल अछि। माने ई शेर बहरे-हजजमे कहल गेल छै। ऐ गजलक आनो शेरमे मोटामोटी किछु गलतीकेँ छोडि बहरे-हजजक प्रयोग अछि आ किछुठाँ वर्ण दुरुस्त कऽ देला पर ई गजल अरबी बहर बहरे-हजजमे अछि। ई एकटा उदाहरण अछि, एहन आरो गजल ऐ संग्रहमे छै जे वर्ण आ मात्रामे किछु परिवर्तन भेला पर अरबी बहरमे कहल मानल जाएत। हमरा ई आस अछि जे गजलकार अपन अगिला गजल संग्रहमे ऐ बातक धेआन राखताह आ अरबी बहर युक्त गजल कहिकऽ मैथिली गजलकेँ समृद्ध करताह। शेरक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम वा कोनो विराम चिन्ह नै लगेबाक निअम अछि, मुदा पोथीक गजलक शेर सभक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम लगाओल गेल अछि, जे निअमानुकूल नै अछि आ एकर धेआन राखल जएबाक चाही छल।
संवेदनाक स्तरपर ई गजल संग्रह बड्ड नीक अछि आ गजलकारक विद्वताकेँ प्रकट करैत अछि। मुदा कएकठाँ भारी भरकम तत्सम आ संस्कृतक शब्दक प्रयोग गजलकेँ बूझबामे भारी बनबैत छै, जाहिसँ बचल जा सकैत छल। गजलमे क्लासिकल भाषाक प्रयोग नहिए हेबाक चाही, अपितु आम प्रयोगक भाषाक प्रयोग गजलक लेल बेसी नीक होइत छै। शेरमे एहन शब्दक प्रयोग जे आम बेबहारमे नै छै, गजलकारक शब्द सामर्थ्यकेँ तँ जरूर देखाबैत छै, मुदा शेरकेँ आम जनसँ दूर सेहो करैत छै। तैं शेर कहबाक काल हमरा हिसाबेँ बेसी क्लिष्ट भाषाक प्रयोगसँ बचबाक चाही।
अंतमे ई कहल जा सकैए जे "अहींक लेल" पोथीक गजल प्रभाग मैथिली गजलक विकसित होइत रूपकेँ अस्पष्टे रूपेँ, मुदा देखबैत जरूर अछि। ई पोथी गजलक व्याकरणक हिसाबेँ किछु गलतीकेँ छोडिकऽ नीक प्रयास अछि। ऐ संग्रहक कएकटा शेरमे अरबी बहरक पालनक प्रयास महत्वपूर्ण आ नोटिस करबाक जोग अछि। कएकठाँ क्लिष्ट आ संस्कृतनिष्ठ शब्दक प्रयोगकेँ जँ कात कए कऽ देखल जाइ तँ संवेदनात्मक स्तरपर सेहो ई संग्रह नीक अछि। मैथिली गजलक विकास यात्रामे ई पोथी गजलक भविष्यक लेल नीक डेग अछि।
- ओम प्रकाश

Wednesday, 7 November 2012

गजल


करेजक बात नै कहियो बनल एतय
कियो सुनलक कहाँ मोनक कहल एतय

सुखायल गाछकेँ पटबैसँ की हेतै
फरत कोना जखन गाछे जरल एतय

हँसी कीनैत रहलौं सदिखने ऐठाँ
लए छी हम नुका आत्मा मरल एतय

लिखलकै भाग्य बिधि सबहक अलग कलमसँ
कपारक गप कियो नै पढि सकल एतय

गडै पर शूल "ओम"क आह नै निकलै
भऽ गेलौं सुन्न काँटे टा गडल एतय
बहरे-हजज
मफाईलुन (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ) - ३ बेर प्रत्येक पाँतिमे