Wednesday, 16 November 2011

मैथिली गजल


पिया जुनि करू बलजोरी, लोक की कहत।
प्रेम करू मुदा चोरी-चोरी, लोक की कहत।

तन्नुक शरीर मोरा यौवन उफनायल,
चुप्पे बान्हू अहाँ प्रेम-डोरी, लोक की कहत।

थमल नै डेग, अहाँ प्रेम-नोत पठाओल,
हम आब बनलौं चकोरी, लोक की कहत।

श्याम रंग मे अहाँक मोर अंग रंगायल,
दीयाबाती मे खेललौं होरी, लोक की कहत।

"ओम"क प्रिया इ आतुर मोन केँ बुझाओल,
कतेक कहब कर जोडि, लोक की कहत।
-------------- वर्ण १६ --------------

Tuesday, 15 November 2011

मैथिली गजल


ओ हमरा बिसरि गेल जे गाबैत रहै छल हमर गीत।
शहरक हवा लागि गेलै आब भेल शहरी हमर मीत।

मोनक कोनटा मे नुकेलक नेनपनक सभ क्रीडा-खेल,
खाइ छलै संगे पटुआ, ओकरा लागै मधुर हमर तीत।

छल जुटल जकरा संग हृदय हमर, रहितो काया दू,
हमरा हरबैथ आब, अपमान बूझैथ ओ हमर जीत।

दोस्तीक सपथ खाइत नै छलै अघाइत ओ हमरा संग,
भसकेलक घर दोस्तीक, द्वेषक बनि गेल हमर भीत।

मीत घुरि आबू, एखनहुँ "ओम"क हृदय मे अहींक वास,
फेर बहाबियो धार दोस्तीक, जे छल अहाँक हमर रीत।
-------------------- वर्ण २२ ---------------------
(हमर नेनपनक मीत केँ समर्पित, जे हमरा बिसरि गेला)

Monday, 14 November 2011

मैथिली गजल


घोघ तर सँ चान उगल, अँगना मे इजोर पसरि गेलै।
मोन हमर छल बान्हल, किया आइ अपने पिछडि गेलै।

मृगनयनी, मोनमोहनी, चंचल नयन सँ प्राण हतल,
मुख पर नयन-कमल, जै सुरभि सँ मोन पजरि गेलै।

सुनि अहाँक वचन, भ' प्रेम मगन, मोन-मयूर नाचल,
प्रेम-बोली तोहर सुनल, इ हृदय नाचि केँ ससरि गेलै।

हिय-आँगन, पायल झन-झन, संगीत मधुर छै बाजल,
रोकि कोना जे मोन नाचल, नै कहब किया नै सम्हरि गेलै।

अहाँक अजगुत रूप देखि केँ, भाव "ओम" रोकि नै सकल,
जे किछ छल मोन राखल, कोना देखू सबटा झहरि गेलै।
---------------------- वर्ण २२ ---------------------

Friday, 11 November 2011

मैथिली गजल


कर जोडै छी सरकार आब रह' दियौ।
कते करब भ्रष्टाचार आब रह' दियौ।

'टू जी', चारा, खान घोटाला, किछो नै छूटल,
भरि गेल अछि 'तिहाड' आब रह' दियौ।

मुखिया बनै सँ पहिने चलै छलौं पैरे,
कोना चढ' लगलौं कार आब रह' दियौ।

कण्ठ मोकि जनताक कते राज करब,
जनता नै छै यौ लाचार आब रह' दियौ।

कोना फूसि बाजि अहाँ "ओम" केँ ठकि लै छी,
केलियै लाजक संहार आब रह' दियौ।
----------- वर्ण १५ ----------------

Thursday, 10 November 2011

मैथिली गजल


मिझबै लेल पेटक आगि देखू पजरि रहल छै आदमी।
जीबाक आस धेने सदिखन कोना मरि रहल छै आदमी।

डेग-डेग मँहगी केर निर्दय जाँत मे पीसल राति दिन,
पीयर मुँह बिहुँसि केँ उठौने कुहरि रहल छै आदमी।

जनसंख्याक नांङरि कियाक बढले जाइ ए बिन थाकल,
फसिलक उपजा कम भेल, सौंसे फरि रहल छै आदमी।

स्वार्थक एहन बिहाडि चलल छै आइ मनुक्खक गाम मे,
सम्बन्धक झरकल गाछ सँ आब झरि रहल छै आदमी।

कहियो हँसीक ईजोर पसरतै "ओम"क अन्हार टोल मे,
यैह सोचैत सलाई विश्वासक रगडि रहल छै आदमी।
-------------------- वर्ण २२ ---------------------

Wednesday, 9 November 2011

मैथिली गजल


हमर हृदयक कुंज-गली मे विचरैत मोनक मीत अहीं छी।
गाबि-गाबि जे मोन सुनाबै सदिखन ओ राग अहीं गीत अहीं छी।

जिनगी हमर पहिने कहियो एते सोअदगर किया नै छल,
सबटा सोआद अहीं मे छै बसल, मीठ, नोनगर, तीत अहीं छी।

आँखिक बाट मोन मे ढुकि केँ प्रेमक घर आलीशान बनेलियै,
ओहि घरक कण-कण मे छै नाम अहींक, ओकर भीत अहीं छी।

जुग-जुग सँ प्रेमक धार मे अहीं हमर पतवार बनल छी,
हमर प्रेमक दुनियाक सुन्नर रंग सबटा आ रीत अहीं छी।

"ओम"क मोन केर कोन-कोन मे बसल रहै छै अहींक सुरभि,
आब ई जमाना सँ की लेनाई प्रिये, हमर हार आ जीत अहीं छी।
------------------------- वर्ण २४ --------------------------

Tuesday, 8 November 2011

मैथिली गजल


गजल

बालुक भीत  बनल  जिनगी चमकै छै कोना।
सुखायल ई  फूल  सम्बन्धक गमकै छै कोना।

नकली मुस्कीक  भीड मे  हरायल कतौ हँसी,
चिन्ता भरल मुँह पर मुस्की  दमकै छै कोना।

पैघ भेल  जाइ छै  मनुक्ख,  झूस विचार भेलै,
कर्म-धार  मे हल्लुक  विचार जमकै छै कोना।

भ'  रहलै  तमाशा  नाचक  बिना सुर-ताल के,
सरगम  कतौ नै  मुदा  पैर  झमकै छै कोना।

काठक  बनल  लोक  रहै छै  ऊँच  मकान मे,
जे सुनै छै कियो नै किछ, "ओम" बमकै छै कोना।
------------------- वर्ण १७ ------------------

Friday, 4 November 2011

मैथिली गजल


किया एना ई भ' गेल छै देखू उनटा व्यवहार।
हर वहै से खढ खाय छै, बकरी खाय अचार।

ककरो तन नै झाँपल, कियो आडम्बर छै केने,
कियो तरसल बूँद लेल, लागल कतौ सचार।

रामनामा ओढि केँ आबै भीतर रखने खंजर,
छै जकर मोन दरिद्र, हमरा देलक हकार।

महगी केर बाण चलै छै चाम देहक नोचैत,
जन-जन ओ बाण सहै भूशायी पडल लाचार।

जीबै केर अधिकार छिनायल "ओम" देखू कोना,
'सुनामी' बनि तडपैत मोन मे भरल विचार।
--------------- वर्ण १८ -----------------

Thursday, 3 November 2011

मैथिली गजल


धरल रहि जैत होशियारी, मोटरी बान्हने की हैत।
जखन टूटल अछि केवाडी, यौ ताला भरने की हैत।

नीमक पात तर चानन कानै ई कोन रीत रचेलै,
जे ई सवार बनल सवारी, नाक रगडने की हैत।

केहेन गाछी अहाँ लगेलौं जे भूताहि भेल जाइ ए यौ,
बढबै लागै जखन बेमारी, दवाई कीनने की हैत।

झरकल मुँह केँ झाँपने नीक होइत छै सदिखन,
राखले रहि जैत ई तैयारी, मुँह केँ रँगने की हैत।

शीशा महग भेल हीरा सँ "ओम" केँ अचरज लागल,
राखले घर भरल बखारी, सगरो कानने की हैत।
------------------ वर्ण २० -------------------

Friday, 28 October 2011

मैथिली गजल


आगि पजरलै जखन, धुआँ उठबे करत यौ।
इ प्रेम मे डूबल मोन खिस्सा रचबे करत यौ।

किया करेज पर खंजर नैनक अहाँ चलेलौं,
ककरो खून भेलै इ दुनिया बूझबे करत यौ।

होइ छै प्रेमक डोरी तन्नुक, एकरा जूनि तोडू,
जोडबै तोडल डोरी गिरह बनबे करत यौ।

राम-नाम मुख रखने प्रेमक बाट नै धेलियै,
प्रेमक बाट जे चलबै मुक्ति भेंटबे करत यौ।

बीत-बीत दुनियाक प्रेमक रंग मे रंगि दियौ,
"ओम"क इ सपना अहाँ संग पूरबे करत यौ।
---------------- वर्ण १८ ----------------

Tuesday, 25 October 2011

मैथिली गजल


मुस्की अहाँक हमर काल बनल अछि।
नैनक चालि जी केँ जंजाल बनल अछि।

अहाँ केँ देखि सुरूज कोनटा नुका गेल,
लाल अहाँक एहन गाल बनल अछि।

लिखते रहै छी पाती अहाँ केँ प्रिये हम,
राखै छी घरे पातीक टाल बनल अछि।

हमरो सुधि कखनो लियौ ने प्रियतम,
अहीं केँ सुमिरैत की हाल बनल अछि।

"ओम" दीप बनि जरै इजोत अहीं लग,
देखू प्रेमक खिस्सा विशाल बनल अछि।
-------------------वर्ण १५--------------------

मैथिली गजल


आउ मिल मोनक दीप जराबी दियाबाती आबि गेलै।
सिनेह तेल, हिया बाती बनाबी दियाबाती आबि गेलै।

अंगना मे फेरता ऊक बाबा दुख रोग भगाबै लेल,
डाह-घृणा केँ हम ऊक घुमाबी दियाबाती आबि गेलै।

दरिद्रा आब कतौ नै रहतै जे सूप डेंगाओल जैत,
मैंया संगे सगरो सूप डेंगाबी दियाबाती आबि गेलै।

हलुआ-पूडी, लड्डू-बताशा सबहक घर बनल छै,
आइ खूब प्रेम-मधुर खुआबी दियाबाती आबि गेलै।

मँहगी, गरीबी, बेरोजगारी, हिंसा केँ नाच पसरल,
"ओम" संग इ सब दूर भगाबी दियाबाती आबि गेलै।
-------------------वर्ण २०--------------------

Monday, 24 October 2011

मैथिली गजल


पिया हमर रूसल जाइत किछ नै बजै छैथ।
करब हम कोन उपाय ककरो नै सुनै छैथ।

बड्ड जतन सँ कोठा बनल जे सून पडल छै,
कत' सँ भेंटल हकार पिया घुरि नै तकै छैथ।

आउ सखि शृंगार करू मोर पिया केँ मोन भावै,
कोन निन्न मे सूतला हमरा किया नै देखै छैथ।

चानन काठ केर महफा छै बहुत सजाओल,
ओहि मे ल' चलल पिया केँ कनियो नै कनै छैथ।

सासुरक सनेस पर "ओम" केँ लागल उजाही,
नैहरक सखा सभ छूटल यादि नै आबै छैथ।
----------------वर्ण १८-----------------

मैथिली गजल


धार नहि होइ ए मुक्त, बान्ह केँ कोना के तोडब।
बहैत हवा मुट्ठी मे बन्न हम कोना के करब।

सपना होइ छै सपना कतबो सोहाओन हुए,
निन्न टूटै पर ओकरा अपन कोना के कहब।

अनकर आस बेनियाक बसात सत्ते कहै छै,
ककरो मुँह केँ ताकैत आस मे कोना के रहब।

नोंचि लेलियै कियाक अहाँ सुन्नर पंख चिडै केँ,
बिन पंख आकाशक नोत आब कोना के पूरब।

बिलमि जइयो कनी "ओम"क गाम मे किछ खन,
केहन छै गाम हमर से अहाँ कोना के बूझब।
-----------------वर्ण १८-----------------

Thursday, 20 October 2011

हिन्दी गजल


रुखसत की इजाजत क्यों हमसे माँगते हैं वो।
नहीं रुखसत का चलन यहाँ ये जानते हैं वो।

चस्पा हैं उनकी यादें दिल के अन्दर करीने से,
इन यादों को दिल से मिटाना कहाँ जानते हैं वो।

उनके रहते हम बहुत निश्चिन्त रहते थे,
अब होगा क्या मेरा खूब मुझे पहचानते हैं वो।

खुश रहें फूले-फलें, हमको याद करते रहें,
यकीन है कि हमको अपना साया मानते हैं वो।

फूलों की तरह खिलते रहें, "ओम" की यही दुआ,
नम आँखों से निकली दुआ पढना जानते हैं वो।