Thursday, 30 June 2016

विहनि कथा

विहनि कथा
मातृवत परदारेषु
इसकूलेक समैसँ ओ पढ़ैत छल "मातृवत परदारेषु"। श्लोकक ई अंश ओ सबकेँ सुनाबैत छल। आब ओ नौकरी करैए। ओ एखनो धरि ई श्लोक अंश दोहराबैत रहैए। मुदा सड़क पर, बसमे वा ट्रेनमे कोनो स्त्री वा बालिकाकेँ देखैत देरी ओकर आँखिमे एकटा चमक आबि जाइ छै आ ओ अपन नजरिसँ ओकर सभक देह ऊपरसँ नीचा धरि नापि लैत अछि। कतेको बेर ओ ऐ कलाक प्रदर्शनक बाद स्त्रिगण सभक कोपभाजन सेहो बनि चुकल अछि। मुदा आदतिमे कोनो बदलाव नै। कहल गेल अछि जे चालि, प्रकृति, बेमाय, तीनू संगे लागल जाय। आइ चौक पर जखन ओ अपन कलाक प्रदर्शन करैत छल तखन पीड़ित स्त्रीक हल्ला करै पर भीड़ ओकर पूजा क' देलकै लात जूतासँ। जावत किछु लोक ओकरा बचेलकै तावत ओकर मुँह कान फूलि चुकल रहै। हम जखन चौक पर पहुँचलौं तँ ओ अपन पूजा करबा क' चलि आबैत छल। हम पूछलिए की हाल चाल मीता। ओ कहरैत बाजल हाल देखिये रहल छह आ चालि हमर बूझले छह जे मातृवत परदारेषु।

कविता

कविता
मधुमास
सुनलियै मधुमास आएल छै।
दमकैत रंगल मुँह चारू कात
पिपही बाजाक सुर ताल
कहि रहलए चिकरि क'
मधुमास आएल छै।
भौजी दियरक ठट्ठा
सारि बहिनोईक मजाक
कहि रहलए चिकरि क'
मधुमास आएल छै।
जुआनक मचल जोगीरा
बूढ़क चमकैत मुखारविंद
कहि रहलए चिकरि क'
मधुमास आएल छै।
आमक मज्जरक सुगंध
सरिसबक पीयर कुसुम
कहि रहलए चिकरि क'
मधुमास आएल छै।
उत्साह आ जोशक धार
पसरल गाम आ नगर
कहि रहलए चिकरि क'
मधुमास आएल छै।
मुदा की सबहक छै मधुमास?
कियो बुतातक जोगाड़मे लागल
लोक व्यस्त अछि कोदारि धएने
ओकर छै खरमास सब दिन
मधुमासक आसमे।
मुदा कहियो अएबे करतै
ओकरो आँगनमे मधुमास
ई सोचैत लागल अछि
ओ मधुमासक स्वागतमे।
यावत नै पसरत मधुमास
सबहक आँगनमे,
तावत ऐ मधुमासमे
रंग किछु कमे रहत।

मन का बात

बहुत पहिले हम ई सुनते थे कि किसान लोग बैंक से जे लोन लेगा ऊ बाद में माफ हो जाएगा। बस फेर क्या था, ढेरी किसान सब लोन ले लिया बैंकवन सब से। बहुते दिन तक तो लोन वसूली खातिर बैंकवन सब खूबे प्रयास किया। पर जब वसूली में फेल हो गिया तो ई लोनमा सब के नन परफार्मिंग एसेट घोषित कर दिया। तभीये हमहूँ ई जाने कि नन परफार्मिंग एसेट भी एकठो बैंकिंग टर्म है। खैर बाद में देखे कि ठीके में किसान सब के लोन माफ हो गिया। अब तो जे सब लोन नै लिया था ऊ सब अफसोस करे लगा कि हमहूँ सब काहे नहीं लोनमा ले लिए थे। खैर ई तो हुआ किसान लोन के गप। इधर कुछ समय से ई ट्रेन्ड देखते हैं कि बड़को लोग सब बैंकवन सब से लोन ले ले के खएले जा रहा है। ई बात पर बहुते हंगामा भी हो रहा है। हमको ई में हंगामा के कोई बात नै समझ में आता है। बड़कन लोग सब बैंक से लोन थोड़े लेता है। ऊ सब तो बैंक से फाइनेंस करवाता है जी। ऊ सब लोन काहे नै लेगा। सब लोग के बैंक से लोन लेबे के हक है कि नहीं। इहो हो सकता है कि ऊ लोग ई सोचा होगा कि किसाने लोन के जैसन ई बिजनेसो लोन न कहीं माफ हो जाए। या दीर्घायु होने के लिए भी लोन लिया होगा। काहे कि पहले से ई कहा गिया है-
करजा ले ले चाटिए जब लगे घट में प्राण
देने वाला रोएगा जब मरने पर श्रीमान
कि जैसे बाप मरा हो।
अब अगर ककरो बेसी दिन तक जीबे के इच्छा है तो करजा ले के चाटना ही चाहिए। काहे कि करजा देबे वाला सब भगवान से ओकर लंबा उमर के प्रार्थना करबे करेगा जी। कुछ भायजी लोग बैंकवन सब पर आरोप लगा रहा है कि एतना एतना लोन कैसे दे दिया बिना भेरिफाई कएले। अरे भाई अपना बैंकवन सब एतना काम में लगल रहता है कि बड़कन लोग सब के भेरिफाई करे में टाइम वेस्ट काहे करेगा। पूरा मार्केट में एतना हाउसिंग, गाड़ी और बिजनेस लोन देले है ई बैंकवा सब कि पूरा टाइम तो उधरे इनभेस्ट हो जाता है। बड़कन लोग सब के चेहरबो के तो कुछ फेस भैल्यू होता है जी। हम ई पोस्टवा के माध्यम से तमाम बैंकवन के डंडवत करते हैं कि ऊ सब पक्का समाजवादी हैं। छोटकन लोग सब के जेतना नन परफार्मिंग एसेट बेस तैयार किए थे ऊ सब, ओतने बड़कन लोग सब के भी तैयार कर लिए। वाह, परफार्मेन्स इसी को कहते हैं ऊ भी समाजवादी ईस्टाईल में। हम उन तमाम बड़कन लोग सब के भी डंडवत करते हैं जो समाजवाद को पूरा फौलो करने में बैंकवन सब के मदद किए हैं ताकि बैंकवन सब जेतना नन परफारमिंग एसेट किसान लोन में तैयार किया था ओतना ई लोगन के भी लोन देने में तैयार कर लिया है। अंत में, हमको कोई भायजी या बहिनजी ई समझाएँगे कि ई बड़कन लोग सब जे लोन लिया ऊ केने घुसड़ गिया काहे कि बैंकवन सब के वसूली के लिए कोनो एसेटे नै भेंटाता है। ई कोश्चन हमको बहुते परेशान किए हुए है। ई हमर मोन का बात था जे आप लोगन से शेयर किए और जिनको गोस्सा और तकलीफ हुआ हो तो उनसे माफियो माँगिये रहे हैं।

गजल

ताकै छी, अपन पता चाही
जिनगी जे कहै, कथा चाही
हम छी खोलने करेजाकेँ
छै गुमकी, कनी हवा चाही
नै चाही जगतसँ किछु हमरा
हमरा बस सभक दुआ चाही
लूटलकै मजा बहुत सब यौ
हमरो आब ई मजा चाही
"ओम"क छै करेज ई पजरल
नेहक एकरा सजा चाही

गजल

हारल करेजक हाल की कहू
जागल सिनेहक हाल की कहू
प्रेमक नगरमे अछि बसल हिया
बारल विदेहक हाल की कहू
सदिखन लिखै छी नेह हम अपन
राखल सनेसक हाल की कहू
कोना क' बीतल राति ई हमर
काटल बिदेसक हाल की कहू
बेकल बनल "ओम"क करेज ई
मारल उछेहक हाल की कहू

गजल

अहाँ तोड़ैत रहू, हम जोड़ाइते रहब
नशा छी एहन, सबकेँ सोहाइते रहब
रहत छाती पर छापल ई नाम टा हमर
कते पोछब हमरा, हम ठोकाइते रहब
अहाँ कोड़ू हमरा नै बाजब किछो सुनू
बनल छी सागक बाड़ी, कोड़ाइते रहब
किया छी बारल नजरिसँ हम देखियौ कनी
सुनब चर्चा हमरो आ नोराइते रहब
करेजा 'ओम'क करबै टुकड़ी कतेक यौ
भ' गेलौं तार करेजक, मोड़ाइते रहब
-ओम प्रकाश,

Thursday, 10 March 2016

गजल

रूप मदिर, मदिराएल नैन
मेघ सनक करियाएल नैन
बालम बसि गेला कोन देस
राति बढ़ल अगुताएल नैन
चान पिया भेलौं हम चकोर
कानि कहल बिसराएल नैन
ओकर छवि देखै भोर-साँझ
यादि भरल सपनाएल नैन
"ओम" पिया अउता आइ सुनि क'
नाचि उठल हरखाएल नैन
मात्राक्रम 2-1, 1-2, 2-2-2-1, 2-1 प्रत्येक पाँतिमे एक बेर। सुझाव सादर आमंत्रित।
-ओम प्रकाश

मन का बात

बचपन में हम सोचते थे कि आखिर मछली कैसे पकड़ाता है। बाबूजी से पूछे तो ऊ डाँट दिए। कहे कि बड़ा हो के मछलिए मारेगा का। हम सकदम चुप हो गए। एक बार जखनी गाम गए ना तो उहाँ पर अलग अलग ईस्टाईल में मछलिया पकड़ते देखे। जब कक्का से पूछे तो ऊ हमको सब ईस्टाईलबा के बारे में बताए। बंसी से बोर देके नेन्हकी मछलिया सब धराता था। बड़की मछलिया सब जाल फेंक के धराता था। जाल में एकदिन एकठो दस से पन्द्रह किलो का मछली धराया था जो जाले फाड़ के भाग गया। कक्का समझाए कि बड़का मछलिया पकड़ना एतना आसान नै है से बूझ लो। छोटकी मछलिया आरामे से पकड़ा जाता है। खैर जब गाम से घूर के आ गए तब इसी फिराक में रहते थे कि मछली पकड़न ज्ञान का पिरेकटीकल किया जाय। लेकिन स्साला कोनो जोगाड़े नै भेंटता था। एक रोज इसकूल से आने टाईम एकठो खंता में मछलिए जैसन चीज देखे। फिर क्या था उतर गए खंता में और दनादन दस ठो छोटकी मछलिया पकड़े और कौपी से पन्ना फाड़ के ठोंगा बनाए जिसमें मछलिया सबको रखकर घर ले आए। पूरा कपडा में कादो लगल देखके माय जो बमकी सो का कहें। ऊ घड़ी 'दाग अच्छे हैं' बला परचरबो तो नै आया था। मछली देखके तो माय आरो गोस्सा गई। बोली कि एक तो कपड़बा गंदा कर लिया और ऊपर से बेंगमछली पकड़ के ले आया। ऊ घड़ी हमरा मछली आ बेंगमछली के अंतर थोड़े बूझल था। खैर एतना दिन बाद ई प्रसंग इसलिए मोन पड़ गिया कि समाचार में एक जगह पढ़े कि बड़ी मछली पुलिस के पकड़ से बाहर। ई कहना आसान है कि पुलिस बड़ा मछली नै पकड़ता है पर बड़ा मछली पकड़ने में केतना कष्ट है ई हम अपन आँख से देखे हैं जी। या तो जाले फाड़ देगा नै तो पूछरी से मार मार के देह फोड़ देगा।एही से कहते हैं कि खंता में जा के बेंगमछलियन सब के धरना चाहिए जो ऊ लोग कर रहे हैं। उन सबको हमर डंडवत है काहे कि मछलिया पकड़ तो रहे हैं ना, भले बेंगमछलिए हो। आशा है कि हमरा मोन का बात सुन के ऊ लोग गोसियायेंगे नै।

शायरी

नारीकेँ नै वस्तु बुझू, नारीक सम्मान करू
माए, बेटी, बहिन हमर, नै कोनो अपमान करू

मन का बात

हम जहिया स्टुडेन्ट थे, तहिया बाबूजी पढ़ते रहने के लिए एक्के ठो धमकी देते थे। कहते थे कि रे गदहा ठीक से पढ़, नै तो एक ठो भैंस कीन देंगे आ तू भैंस चराना। ऊ ई बात एतना आथेन्टिकली कहते थे कि हमरा सब.के सपनो में भैंस देखाता था। ऊ एकठो बात औरो कहते थे कि व्यस्क होने का उमर पहले 21 था और अब 18 है और जब तू व्यस्क हो जाएगा तब पिछवाड़ा पर लात दे के बाहर कर देंगे। बाद में उन्होंने लात मारने की उमर बढ़ा के 25 कर दिया। और ई भी कहा कि 25 बरस के बाद पढ़ाई नहीं होती है। हमहू सब जोड़ घटाव कर के देखे कि आई. ए. बी. ए. एम. ए. आदि करने में 25 बरस तक होइए जाता है अगर सेशन लेटो हो जाए तैयो। अगर पी. एच. डी. करेगा तो दू साल औरो जायेगा। खैर बाबूजी के धमकी का ई रिजल्ट हुआ कि बाईसे बरस में नौकरी करने लगे। इधर यूनिवर्सिटी सब का बवाल समाचार में आया तो ई देखे कि हुआँ तो स्टुडेन्टवन सब पैंतीस आ चालीसो के उमर में पढ़िये रहा है। उनका बाबूजी लोग केतना अच्छा है। नौकरिया में लग जाएगा तो देश में हलचल कैसे मचाएगा। हम आज इस पोस्टवा के माध्यम से ऐसन सब स्टुडेन्टवन सब के डंडवत करते हैं जो नौकरिया के चिन्ता छोड़ के बुढ़ारी तक पढाई में लगल है आ देश में हलचल मचइले है।उनकर बाबूओजी सब के डंडवत करते हैं। आप लोग हमरे मन का बात सुन के गोसियाइएगा नहीं से प्रार्थना है।

गजल

आजकल मजमे में जाने से डरता हूँ
गूँज रहे नारों के फ़साने से डरता हूँ
बंद मुट्ठी आया था फैले हाथ ही जाऊँगा
फिर भी जाने क्यों मैं ज़माने से डरता हूँ
हौसला बहुत है, ऐसा दिल कहता है
यहाँ पे ख़ुद को आज़माने से डरता हूँ
सब की क़िस्मत की अपनी ही कहानी है
खुदी है पेशानी पर, सुनाने से डरता हूँ
जाने हुए चेहरे अजनबी से लगते हैं
अब तो इनको मैं अपनाने से डरता हूँ
-ओम प्रकाश

गजल

रंगि दिय' हमरा रंग बसंती
आब चाही हम अंग बसंती
ओकरे नामे लीखल जिनगी
भेल छै ओकर संग बसंती
ढंग एहन बनि जाय हमर जे
सब कहै देखू ढंग बसंती
जोश जे नबका फेरसँ चढ़लै
विस्मयसँ भेलै दंग बसंती
शत्रु "ओम"क रण छोड़ि पड़ायत
हम लड़ब एहन जंग बसंती
मात्राक्रम 2-1-2, 2-2-2-1, 1-2-2 सब पाँतिमे एक बेर। सुझाव सादर आमंत्रित।

गजल

आसक डोरि टूटि चुकल अछि
भाग्यक घैल फूटि चुकल अछि
आबो मोन बाट तकै छै
रस्ता कहिये छूटि चुकल अछि
की कहियै समैक ई लीला
प्रेमक गीत कूटि चुकल अछि
छलियै प्रिय हुनकर कहियो
खिस्सा बनि क' छूटि चुकल अछि
"ओम"क मोन मोर बनल छै
मोनक तान लूटि चुकल अछि
दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व, दीर्घ-ह्रस्व, ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ प्रत्येक पाँतिमे एक बेर। दोसर शेरक दोसर पाँतिमे आ तेसर शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ ह्रस्व मानबाक छूट लेल गेल अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि।

गजल

सुनते कभी तुम तो हम भी सुनाते
मुहब्बत की प्यारी बातें बताते
जुल्फों की लट है कि काली घटा है
उलझन दिलों की है, ये सुलझाते
आँखों की मदिरा बहुत है नशीली
नशा इन आँखों का दिल को पिलाते
तुम्हारी हमारी मुलाकात को हम
किताबों का प्यारा पन्ना बनाते
गुजरते कभी "ओम" की गली से भी
तो कदमों में तेरी ये दुनिया लुटाते
ओम प्रकाश

कविता

चिड़ै आ बहेलिया
भोरे-भोर आँगनमे
उतरि जाइए चिड़ै।
चुहचुहाइत, फुदकैत,
पसारल अनाज पर
लोल मारैत चिड़ै।
हाँटबै जखने
तँ फुर्र उड़ि जाइए
आकाशक पसरल आँचरमे।
आजादीक उत्कर्षक
परम विमर्श अछि चिड़ै।
ओकर उड़ानमे लय छै,
जिनगीक संगीतक लय,
नब आसक लय,
नब बासक लय।
मुदा ओ बेखबर अछि
बहेलियाक नजरिसँ।
चंडाल बहेलिया
अट्टहास करैए
आकाशसँ ऊँच।
सौंसे सृष्टिमे पसरल
ओकर वीभत्स अट्टहास।
अट्टहासक पाछू
नुकाएल छै
ओकर शिकारी आँखि।
गुलामीक उत्कर्षक
परम विमर्श अछि बहेलिया।
ओकर अट्टहासमे छै
समेटल क्रूर चालि,
मारि खसेबाक चालि,
शांत क' देबाक चालि।
ठाँय।
ई थीक गोलीक आवाज।
खसि पड़ल चिड़ै भू-लुंठित।
ओकर माटिमे सानल
निष्प्राण देह
द' रहल अछि
बहेलियाक करतूतक गवाही।
मुदा आजादीक उत्कर्षक
विमर्श खतम नै भेल।
एखनो उड़िये रहल अछि
एकटा आर चिड़ै
नीलगगनक छाती पर।
एखनो ताकिये रहल अछि
बहेलियाक नजरि
क्रूर अट्टहासक संग।
ओम प्रकाश