मैदान सजल छल जैमे भिड़ल छल सब लोक किछु छल अपसियाँत किछु पर लागल रोक किछु पर लागल रोक जे मुँहदुब्बर छल खेलाड़ ओकरा पर लागल पेनाल्टी देखू बहुत प्रकार कहै छथि ओम कवि सुनि लिअ लगा क' ध्यान जँ अछि किछु पैरवी अहाँ तखने उतरू मैदान
दुख ऐ बातक नैए जे ओ हमरा नै चिन्हलथि मुदा हम दुखी छी जे ओ हमरा नै बूझलथि विष भरल सुन्नर मुस्की चिन्हबामे नै आएल मुस्कीक पाछू की नुकाएल हमरा नै कहलथि हुनकर छनि फहराइत पताका सर सर सगरो हमर झूस ध्वजा अछि से हमरा नै बजलथि केहेन केहेन लोकक ओ बनल रहै छथि संगी हम बनेलौं चिक्कन मुँह तइयो हमरा नै सहलथि
समर्पित अछि ओइ मित्रकेँ जे हमरा गलत बूझलथि। आशा अछि जे ओ हमर उदगार पढ़ि क' अपन मोन साफ करताह।
सावित्री भोरेसँ चिन्तित छलीह। दू दिनसँ बेटासँ कोनो गप नै भेल छलैन्हि। बेटा रमेश बंगलौरमे इंजीनियर छलाह।हुनका फुरसति कम होईत छलैन्हि। तैं ओ गाम नै आबैत छलाह। माता पिता सालमे एक दू बेर बंगलौर प्रवास क' कए हुनकासँ भेंट क' आबैत छलखिन्ह। मुदा फोन पर प्रतिदिन एक बेर गप भ' जाईत छलैन्हि। जहिया गप नै होइन्हि तहिया माताजी चिन्तित भ' जाईत छलखिन्ह। पछिला दू दिनसँ नै रमेशक फोन आएल छल आ नै ओ माएक फोन उठबै छलाह। तैं माए एते चिन्तित छलीह। ओ रमेशक बाबूकेँ कहलखिन्ह जे एक बेर फेरसँ फोन लगबियौ ने। ओ फेरसँ फोन लगा क' सावित्रीक हाथमे फोन द' देलखिन्ह। ऐ बेर रमेश फोन उठा लेलक। मुदा फोन उठबिते माएसँ कह' लागल जे दू दिनसँ आफिसक काजसँ अलगे परेशान छी आ अहाँक फोनसँ अलगे। माए कहलखिन्ह जे बउआ कमसँ कम एक बेर रोज अपन समाचार बता देल करू तँ हम निश्चिंत रहब। अहाँ परदेसमे रहै छी ने। पुत्र कहलखिन्ह जे नो न्यूज इज गुड न्यूज होइत छै से नै बूझै छिही। ई छुछका मोह देखेनाइ बन्न कर आ फोन राख। एखन ऊपरसँ टीम आएल छै आ बड्ड काज अछि। ई कहैत ओ फोन काटि देलक। माएक मुँह अप्रतिभ भ' गेलै। मुदा ओ अपन भावनाकेँ सम्हारैत फोन अपन पतिकेँ घूमबैत बाजलीह जे बउआ नीके छथि। हम हुनकर आवाज सुनि लेलियैन्हि। ई फोन बड्ड नीक होईत छै। जँ ई नै रहितै तँ बउआक कुशल क्षेम कोना बुझितौं। ई कहैत ओ भनसाघर दिस नोरियाएल आँखिये बढ़ि गेलीह।